पुष्प संस्थान की ओर से चलाए जा रहे मेरी स्कूल कार्यक्रम में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। संस्थान की ओर से शिक्षा से वंचित बच्चों, महिलाओं व पुरुषों के लिए चलाए जा रहे इस कार्यक्रम को जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, टोंक व बीकानेर में विशेष प्रोत्साहन मिल रहा है।
हाल ही सीकर के एक गांव में चल रही मेरी स्कूल कार्यक्रम में जाने का मौका लगा। घर का काम-काज निपटा कर पढ़ाई में जुटी महिलाएं फल-सब्जियों के अंग्रेजी नामों को
दिलचस्पी के साथ पढ़-लिख रही थीं। पूरी तरह मस्ती से सराबोर इस पाठशाला में देसी लेप लगे आंगन ने गुदडिय़ां बिछा कर पढ़ाई करवाई जा रही थी। दिलचस्प बात यह भी थी कि मेरी स्कूल में पढऩे वाली सभी महिलाएं ऐसी थी, जिन्होंने पहली बार पुस्तकों को थामा है। स्लेट हाथों में ली हैं और खेत-खलिहान व घर-आंगन
के काम से समय निकाल कर पढऩे का निर्णय लिया है।
दिलचस्पी के साथ पढ़-लिख रही थीं। पूरी तरह मस्ती से सराबोर इस पाठशाला में देसी लेप लगे आंगन ने गुदडिय़ां बिछा कर पढ़ाई करवाई जा रही थी। दिलचस्प बात यह भी थी कि मेरी स्कूल में पढऩे वाली सभी महिलाएं ऐसी थी, जिन्होंने पहली बार पुस्तकों को थामा है। स्लेट हाथों में ली हैं और खेत-खलिहान व घर-आंगन
के काम से समय निकाल कर पढऩे का निर्णय लिया है।
इस मौके पर संस्थान अध्यक्ष प्रभा देवी ने कक्षा में पढ़ रही शीलू, मनभरी, बिमला, सुमन, सुनीता और सुलोचना को नई किताबें, पैन व अन्य जरूरी सामग्री वितरित की। संस्थान अध्यक्ष प्रभा देवी के मुताबिक, 'प्रयास नन्हे हैं, लेकिन नियमित हैं। यह अच्छी बात है। इस स्कूल में पढ़ रही मनभरी 78 साल की है, लेकिन अपनी बहुओं के साथ पढऩे में उन्हें कोई गुरेज नहीं। इससे अच्छी बात पुष्प संस्थान की टीम के लिए और क्या हो सकती है। इन महिलाओं के साथ हम और भी महिलाओं से मिल रहे हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा निरक्षर महिलाएं साक्षर हों और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हों। उनसे वाकिफ हों और उन्हें जान सकें।
मैंने पढऩा शुरू कर दिया है। उम्र साथ नहीं देती, लेकिन बहुओं के साथ दोपहर को पढ़ती हूँ। अच्छा है पोते-पोतियों से भी पढ़ाई की बातें कर सकती हूँ। पहले कभी पढ़ नहीं पाई। पढ़ाई के दिनों में तो घर के काम-काम इतने थे कि मां-बापू ने कभी सोचा भी नहीं। बुढ़ापे में ही सही, मनभरी लिखना तो सीख ही गई हूँ।
- मनभरी देवी,उम्र : 78 वर्ष, सीकर
मैंने पढऩा शुरू कर दिया है। उम्र साथ नहीं देती, लेकिन बहुओं के साथ दोपहर को पढ़ती हूँ। अच्छा है पोते-पोतियों से भी पढ़ाई की बातें कर सकती हूँ। पहले कभी पढ़ नहीं पाई। पढ़ाई के दिनों में तो घर के काम-काम इतने थे कि मां-बापू ने कभी सोचा भी नहीं। बुढ़ापे में ही सही, मनभरी लिखना तो सीख ही गई हूँ।
- मनभरी देवी,उम्र : 78 वर्ष, सीकर



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